2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 18 / Shloka 29 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 18
Shloka 29

Ayodhyakand

119 Sarga
41 Shloka
2/18/29
2-Ayodhyakand / Sarga 18 Shloka 29
Shloka
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे।
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च॥ २९॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘अहो! धिक्कार है! देवि! तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये। मैं महाराजके कहनेसे आगमें भी कूद सकता हूँ, तीव्र विषका भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्रमें भी गिर सकता हूँ! महाराज मेरे गुरु, पिता और हितैषी हैं, मैं उनकी आज्ञा पाकर क्या नहीं कर सकता? इसलिये देवि! राजाको जो अभीष्ट है, वह बात मुझे बताओ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे पूर्ण करूँगा। राम दो तरहकी बात नहीं करता है’॥ २८—३०॥