2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 17 / Shloka 4 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 17
Shloka 4

Ayodhyakand

119 Sarga
22 Shloka
2/17/4
2-Ayodhyakand / Sarga 17 Shloka 4
Shloka
उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च।
अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि॥ ४॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

अच्छी श्रेणीके चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्धद्रव्यों, अलसी या सन आदिके रेशोंसे बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रोंके ढेर, अनबिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्गकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह नाना प्रकारके पुष्पों तथा भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थोंसे भरा हुआ था। उसके चौराहोंकी दही, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकारके पुष्पहार और गन्धद्रव्योंसे सदा पूजा की जाती थी। स्वर्गलोकमें बैठे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति रथारूढ़ श्रीरामने उस राजमार्गको देखा॥ ३—६॥