2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 17 / Shloka 22 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 17
Shloka 22

Ayodhyakand

119 Sarga
22 Shloka
2/17/22
2-Ayodhyakand / Sarga 17 Shloka 22
Shloka
तस्मिन् प्रविष्टे पितुरन्तिकं तदा
जनः स सर्वो मुदितो नृपात्मजे।
प्रतीक्षते तस्य पुनः स्म निर्गमं
यथोदयं चन्द्रमसः सरित्पतिः॥ २२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

जब राजकुमार श्रीराम पिताके पास जानेके लिये अन्त:पुरमें प्रविष्ट हुए, तब आनन्दमग्न हुए सब लोग बाहर खड़े होकर उनके पुन: निकलनेकी प्रतीक्षा करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र चन्द्रोदयकी प्रतीक्षा करता रहता है॥ २२॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १७॥