2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 17 / Shloka 19 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 17
Shloka 19

Ayodhyakand

119 Sarga
22 Shloka
2/17/19
2-Ayodhyakand / Sarga 17 Shloka 19
Shloka
तत् पृथिव्यां गृहवरं महेन्द्रसदनोपमम्।
राजपुत्रः पितुर्वेश्म प्रविवेश श्रिया ज्वलन्॥ १९॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

राजा दशरथका भवन मेघसमूहोंके समान शोभा पानेवाले, सुन्दर अनेक रूप-रंगवाले कैलासशिखरके समान उज्ज्वल प्रासादशिखरों (अट्टालिकाओं) से सुशोभित था। उसमें रत्नोंकी जालीसे विभूषित तथा विमानाकार क्रीड़ागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभासे प्रकाशित होते थे। वे अपनी ऊँचाईसे आकाशको भी लाँघते हुए-से प्रतीत होते थे; ऐसे गृहोंसे युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतलपर इन्द्रसदनके समान शोभा पाता था। उस राजभवनके पास पहुँचकर अपनी शोभासे प्रकाशित होनेवाले राजकुमार श्रीरामने पिताके महलमें प्रवेश किया॥ १७—१९॥