2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 17 / Shloka 18 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 17
Shloka 18

Ayodhyakand

119 Sarga
22 Shloka
2/17/18
2-Ayodhyakand / Sarga 17 Shloka 18
Shloka
आवारयद्भिर्गगनं विमानैरिव पाण्डुरैः।
वर्धमानगृहैश्चापि रत्नजालपरिष्कृतैः॥ १८॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

राजा दशरथका भवन मेघसमूहोंके समान शोभा पानेवाले, सुन्दर अनेक रूप-रंगवाले कैलासशिखरके समान उज्ज्वल प्रासादशिखरों (अट्टालिकाओं) से सुशोभित था। उसमें रत्नोंकी जालीसे विभूषित तथा विमानाकार क्रीड़ागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभासे प्रकाशित होते थे। वे अपनी ऊँचाईसे आकाशको भी लाँघते हुए-से प्रतीत होते थे; ऐसे गृहोंसे युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतलपर इन्द्रसदनके समान शोभा पाता था। उस राजभवनके पास पहुँचकर अपनी शोभासे प्रकाशित होनेवाले राजकुमार श्रीरामने पिताके महलमें प्रवेश किया॥ १७—१९॥