2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 16 / Shloka 47 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 16
Shloka 47

Ayodhyakand

119 Sarga
47 Shloka
2/16/47
2-Ayodhyakand / Sarga 16 Shloka 47
Shloka
करेणुमातङ्गरथाश्वसंकुलं
महाजनौघैः परिपूर्णचत्वरम्।
प्रभूतरत्नं बहुपण्यसंचयं
ददर्श रामो विमलं महापथम्॥ ४७॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

यात्रा करते हुए श्रीरामने उस विशाल राजमार्गको देखा, जो हथिनियों, मतवाले हाथियों, रथों और घोड़ोंसे खचाखच भरा हुआ था। उसके प्रत्येक चौराहेपर मनुष्योंकी भारी भीड़ इकट्ठी हो रही थी। उसके दोनों पार्श्वभागोंमें प्रचुर रत्नोंसे भरी हुई दुकानें थीं तथा विक्रयके योग्य और भी बहुत-से द्रव्योंके ढेर वहाँ दिखायी देते थे। वह राजमार्ग बहुत साफ-सुथरा था॥ ४७॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १६॥