2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 15 / Shloka 7 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 15
Shloka 7

Ayodhyakand

119 Sarga
48 Shloka
2/15/7
2-Ayodhyakand / Sarga 15 Shloka 7
Shloka
ताभ्यश्चैवाहृतं तोयं समुद्रेभ्यश्च सर्वशः।
क्षौद्रं दधि घृतं लाजा दर्भाः सुमनसः पयः॥ ७॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

इनके सिवा जो अन्य नदियाँ, पवित्र जलाशय, कूप और सरोवर हैं तथा जो पूर्वकी ओर बहनेवाली (गोदावरी और कावेरी आदि) नदियाँ हैं, ऊपरकी ओर प्रवाहवाले जो (ब्रह्मावर्त आदि) सरोवर हैं तथा दक्षिण और उत्तरकी ओर बहनेवाली जो (गण्डकी एवं शोणभद्र आदि) नदियाँ हैं, जिनमें दूधके समान निर्मल जल भरा रहता है, उन सबसे और समस्त समुद्रोंसे भी लाया हुआ जल वहाँ संग्रह करके रखा गया था। इनके अतिरिक्त दूध, दही, घी, मधु, लावा, कुश, फूल, आठ सुन्दर कन्याएँ, मदमत्त गजराज और दूधवाले वृक्षोंके पल्लवोंसे ढके हुए सोने-चाँदीके जलपूर्ण कलश भी वहाँ विराजमान थे, जो उत्तम जलसे भरे होनेके साथ ही पद्म और उत्पलोंसे संयुक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे॥ ६—८