2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 15 / Shloka 48 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 15
Shloka 48

Ayodhyakand

119 Sarga
48 Shloka
2/15/48
2-Ayodhyakand / Sarga 15 Shloka 48
Shloka
ततोऽद्रिकूटाचलमेघसंनिभं
महाविमानोपमवेश्मसंयुतम्।
अवार्यमाणः प्रविवेश सारथिः
प्रभूतरत्नं मकरो यथार्णवम्॥ ४८॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

जैसे मगर प्रचुर रत्नोंसे भरे हुए समुद्रमें बेरोक-टोक प्रवेश करता है, उसी प्रकार सारथि सुमन्त्रने पर्वत-शिखरपर आरूढ़ हुए अविचल मेघके समान शोभायमान महान् विमानके सदृश सुन्दर गृहोंसे संयुक्त तथा प्रचुर रत्न-भण्डारसे भरपूर उस महलमें बिना किसी रोक-टोकके प्रवेश किया॥ ४८॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥