2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 14 / Shloka 67 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 14
Shloka 67

Ayodhyakand

119 Sarga
69 Shloka
2/14/67
2-Ayodhyakand / Sarga 14 Shloka 67
Shloka
व्यक्तं रामाभिषेकार्थे इहायास्यति धर्मराट्।
इति सूतो मतिं कृत्वा हर्षेण महता पुनः॥ ६७॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘जान पड़ता है, श्रीरामचन्द्रके अभिषेकके लिये ही यह जल्दी कर रही है। इस कार्यमें धर्मराज राजा दशरथको अधिक आयास करना पड़ता है (शायद इसीलिये ये बाहर नहीं निकलते)।’ ऐसा निश्चय करके महातेजस्वी सूत सुमन्त्र फिर बड़े हर्षके साथ श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे चल पड़े। समुद्रके अन्तर्वर्ती जलाशयके समान उस सुन्दर अन्त:पुरसे निकलकर सुमन्त्रने द्वारके सामने मनुष्योंकी भारी भीड़ एकत्र हुई देखी॥ ६७-६८॥