2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 12 / Shloka 38 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 12
Shloka 38

Ayodhyakand

119 Sarga
112 Shloka
2/12/38
2-Ayodhyakand / Sarga 12 Shloka 38
Shloka
पारं शोकार्णवस्याशु प्रार्थयन्तं पुनः पुनः।
प्रत्युवाचाथ कैकेयी रौद्रा रौद्रतरं वचः॥ ३८॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

महाराज दशरथ इस प्रकार दु:खसे संतप्त होकर विलाप कर रहे थे। उनकी चेतना बार-बार लुप्त हो जाती थी। उनके मस्तिष्कमें चक्कर आ रहा था और वे शोकमग्न हो उस शोकसागरसे शीघ्र पार होनेके लिये बारंबार अनुनय-विनय कर रहे थे, तो भी कैकेयीका हृदय नहीं पिघला। वह और भी भीषण रूप धारण करके अत्यन्त कठोर वाणीमें उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगी—॥ ३७-३८॥