2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 12 / Shloka 37 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 12
Shloka 37

Ayodhyakand

119 Sarga
112 Shloka
2/12/37
2-Ayodhyakand / Sarga 12 Shloka 37
Shloka
इति दुःखाभिसंतप्तं विलपन्तमचेतनम्।
घूर्णमानं महाराजं शोकेन समभिप्लुतम्॥ ३७॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

महाराज दशरथ इस प्रकार दु:खसे संतप्त होकर विलाप कर रहे थे। उनकी चेतना बार-बार लुप्त हो जाती थी। उनके मस्तिष्कमें चक्कर आ रहा था और वे शोकमग्न हो उस शोकसागरसे शीघ्र पार होनेके लिये बारंबार अनुनय-विनय कर रहे थे, तो भी कैकेयीका हृदय नहीं पिघला। वह और भी भीषण रूप धारण करके अत्यन्त कठोर वाणीमें उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगी—॥ ३७-३८॥