2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 1 / Shloka 32 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 1
Shloka 32

Ayodhyakand

119 Sarga
51 Shloka
2/1/32
2-Ayodhyakand / Sarga 1 Shloka 32
Shloka
सम्मतस्त्रिषु लोकेषु वसुधायाः क्षमागुणैः।
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये चापि शचीपतेः॥ ३२॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

किसी भी प्राणीके मनमें उनके प्रति अवहेलनाका भाव नहीं था। वे कालके वशमें होकर उसके पीछे-पीछे चलनेवाले नहीं थे (काल ही उनके पीछे चलता था)। इस प्रकार उत्तम गुणोंसे युक्त होनेके कारण राजकुमार श्रीराम समस्त प्रजाओं तथा तीनों लोकोंके प्राणियोंके लिये आदरणीय थे। वे अपने क्षमासम्बन्धी गुणोंके द्वारा पृथ्वीकी समानता करते थे। बुद्धिमें बृहस्पति और बल-पराक्रममें शचीपति इन्द्रके तुल्य थे॥ ३१-३२॥