1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 9 / Shloka 5 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 9
Shloka 5

Balkand

77 Sarga
20 Shloka
1/9/5
1-Balkand / Sarga 9 Shloka 5
Shloka
नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात् ।
द्वैविध्यं ब्रह्मचर्यस्य भविष्यति महात्मनः ॥१-९-५॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘सदा पिताके ही साथ रहनेके कारण विप्रवर ऋष्यशृंग दूसरे किसीको नहीं जानेंगे। राजन्! लोकमें ब्रह्मचर्यके दो रूप विख्यात हैं और ब्राह्मणोंने सदा उन दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया है। एक तो है दण्ड, मेखला आदि धारणरूप मुख्य ब्रह्मचर्य और दूसरा है ऋतुकालमें पत्नी-समागमरूप गौण ब्रह्मचर्य। उन महात्माके द्वारा उक्त दोनों प्रकारके ब्रह्मचर्योंका पालन होगा॥५॥