1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 8 / Shloka 16 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 8
Shloka 16

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/8/16
1-Balkand / Sarga 8 Shloka 16
Shloka
शान्तयश्चापि वर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि ।
शक्यः प्राप्तुमयं यज्ञः सर्वेणापि महीक्षिता ॥१-८-१६॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

ब्राह्मणोंका यह कथन सुनकर राजा बहुत संतुष्ट हुए। हर्षसे उनके नेत्र चञ्चल हो उठे। वे अपने मन्त्रियोंसे बोले—‘गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार यज्ञकी सामग्री यहाँ एकत्र की जाय। शक्तिशाली वीरोंके संरक्षणमें उपाध्यायसहित अश्वको छोड़ा जाय। सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण हो। शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्रमश: शान्तिकर्मका विस्तार किया जाय (जिससे विघ्नोंका निवारण हो)। यदि इस श्रेष्ठ यज्ञमें कष्टप्रद अपराध बन जानेका भय न हो तो सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं; परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि विद्वान् ब्रह्मराक्षस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं॥ १३—१७॥