1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 8 / Shloka 13 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 8
Shloka 13

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/8/13
1-Balkand / Sarga 8 Shloka 13
Shloka
यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता ।
ततस्तुष्टोऽभवद् राजा श्रुत्वैतद् द्विजभाषितम् ॥१-८-१३॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

ब्राह्मणोंका यह कथन सुनकर राजा बहुत संतुष्ट हुए। हर्षसे उनके नेत्र चञ्चल हो उठे। वे अपने मन्त्रियोंसे बोले—‘गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार यज्ञकी सामग्री यहाँ एकत्र की जाय। शक्तिशाली वीरोंके संरक्षणमें उपाध्यायसहित अश्वको छोड़ा जाय। सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण हो। शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्रमश: शान्तिकर्मका विस्तार किया जाय (जिससे विघ्नोंका निवारण हो)। यदि इस श्रेष्ठ यज्ञमें कष्टप्रद अपराध बन जानेका भय न हो तो सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं; परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि विद्वान् ब्रह्मराक्षस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं॥ १३—१७॥