1-Balkand / Sarga 77
Shloka 27
Shloka
गुणाद्रूपगुणाच्चापि प्रीतिर्भूयोऽभिवर्धते।तस्याश्च भर्ता द्विगुणं हृदये परिवर्तते ॥२७॥
Sarga 77 / Shloka 27 Balkand