1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 74 / Shloka 19 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 74
Shloka 19

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/74/19
1-Balkand / Sarga 74 Shloka 19
Shloka
स्कन्धे चासज्ज्य परशुं धनुर्विद्युद‍्गणोपमम्।
प्रगृह्य शरमुग्रं च त्रिपुरघ्नं यथा शिवम् ॥१९॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

उस समय राजा दशरथने देखा—क्षत्रिय राजाओंका मान-मर्दन करनेवाले भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार परशुराम सामनेसे आ रहे हैं। वे बड़े भयानक-से दिखायी देते थे। उन्होंने मस्तकपर बड़ी-बड़ी जटाएँ धारण कर रखी थीं। वे कैलासके समान दुर्जय और कालाग्निके समान दु:सह प्रतीत होते थे। तेजोमण्डलद्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे। साधारण लोगोंके लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था। वे कंधेपर फरसा रखे और हाथमें विद्युद्गणोंके समान दीप्तिमान् धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान् शिवके समान जान पड़ते थे॥ १७—१९॥