1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 73 / Shloka 21 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 73
Shloka 21

Balkand

77 Sarga
40 Shloka
1/73/21
1-Balkand / Sarga 73 Shloka 21
Shloka
अलंचकार तां वेदिं गन्धपुष्पैः समन्ततः।
सुवर्णपालिकाभिश्च चित्रकुम्भैश्च साङ्कुरैः ॥२१॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

तब जनकजीसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर महातपस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने विश्वामित्र और धर्मात्मा शतानन्दजीको आगे करके विवाह-मण्डपके मध्यभागमें विधिपूर्वक वेदी बनायी और गन्ध तथा फूलोंके द्वारा उसे चारों ओरसे सुन्दर रूपमें सजाया। साथ ही बहुत-सी सुवर्ण-पालिकाएँ, यवके अंकुरोंसे युक्त चित्रित कलश, अंकुर जमाये हुए सकोरे, धूपयुक्त धूपपात्र, शङ्खपात्र, स्रुवा, स्रुक्, अर्घ्य आदि पूजनपात्र, लावा (खीलों) से भरे हुए पात्र तथा धोये हुए अक्षत आदि समस्त सामग्रियोंको भी यथास्थान रख दिया। तत्पश्चात् महातेजस्वी मुनिवर वसिष्ठजीने बराबर-बराबर कुशोंको वेदीके चारों ओर बिछाकर मन्त्रोच्चारण करते हुए विधिपूर्वक अग्नि-स्थापन किया और विधिको प्रधानता देते हुए मन्त्रपाठपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें हवन किया॥ १९—२४॥