1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 70 / Shloka 33 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 70
Shloka 33

Balkand

77 Sarga
45 Shloka
1/70/33
1-Balkand / Sarga 70 Shloka 33
Shloka
ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षन्ती सुतमुत्तमम्।
तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत् ॥३३॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वतपर भृगुकुलमें उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्यामें लगे हुए थे। हिमालयपर ही उनका आश्रम था। उन दोनों रानियोंमेंसे एक (जिसे जहर दिया गया था) कालिन्दीनामसे प्रसिद्ध थी। विकसित कमलदलके समान नेत्रोंवाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पानेकी इच्छा रखती थी। उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ३१—३३॥