1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 70 / Shloka 31 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 70
Shloka 31

Balkand

77 Sarga
45 Shloka
1/70/31
1-Balkand / Sarga 70 Shloka 31
Shloka
एका गर्भविनाशार्थं सपत्न्यै सगरं ददौ।
ततः शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः ॥३१॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वतपर भृगुकुलमें उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्यामें लगे हुए थे। हिमालयपर ही उनका आश्रम था। उन दोनों रानियोंमेंसे एक (जिसे जहर दिया गया था) कालिन्दीनामसे प्रसिद्ध थी। विकसित कमलदलके समान नेत्रोंवाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पानेकी इच्छा रखती थी। उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ३१—३३॥