1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 7 / Shloka 23 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 7
Shloka 23

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/7/23
1-Balkand / Sarga 7 Shloka 23
Shloka
नाध्यगच्छद्विशिष्टं वा तुल्यं वा शत्रुमात्मनः ।
मित्रवान्नतसामन्तः प्रतापहतकण्टकः ।
स शशास जगद् राजा दिवि देवपतिर्यथा ॥१-७-२३॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

उन्हें कभी अपनेसे बड़ा अथवा अपने समान भी कोई शत्रु नहीं मिला। उनके मित्रोंकी संख्या बहुत थी। सभी सामन्त उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उनके प्रतापसे राज्यके सारे कण्टक (शत्रु एवं चोर आदि) नष्ट हो गये थे। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें रहकर तीनों लोकोंका पालन करते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ अयोध्यामें रहकर सम्पूर्ण जगत्का शासन करते थे॥ २३॥