1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 60 / Shloka 23 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 60
Shloka 23

Balkand

77 Sarga
34 Shloka
1/60/23
1-Balkand / Sarga 60 Shloka 23
Shloka
अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः।
दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टुं समुपचक्रमे ॥२३॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

वे महायशस्वी मुनि क्रोधसे कलुषित हो दक्षिण दिशामें ऋषिमण्डलीके बीच नूतन नक्षत्रमालाओंकी सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्रकी सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्रके ही रहेगा।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओंकी सृष्टि प्रारम्भ की॥ २२-२३॥