1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 60 / Shloka 22 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 60
Shloka 22

Balkand

77 Sarga
34 Shloka
1/60/22
1-Balkand / Sarga 60 Shloka 22
Shloka
दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशाः।
सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः ॥२२॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

वे महायशस्वी मुनि क्रोधसे कलुषित हो दक्षिण दिशामें ऋषिमण्डलीके बीच नूतन नक्षत्रमालाओंकी सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्रकी सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्रके ही रहेगा।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओंकी सृष्टि प्रारम्भ की॥ २२-२३॥