1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 6 / Shloka 26 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 6
Shloka 26

Balkand

77 Sarga
28 Shloka
1/6/26
1-Balkand / Sarga 6 Shloka 26
Shloka
नित्यमत्तैः सदा पूर्णा नागैरचलसंनिभैः ।
सा योजने द्वे च भूयः सत्यनामा प्रकाशते ।
यस्यां दशरथो राजा वसञ्जगदपालयत् ॥१-६-२६॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

हिमालय पर्वतपर उत्पन्न भद्रजातिके, विन्ध्यपर्वतपर उत्पन्न हुए मन्द्रजातिके तथा सह्यपर्वतपर पैदा हुए मृग जातिके हाथी भी वहाँ मौजूद थे। भद्र, मन्द्र और मृग—इन तीनोंके मेलसे उत्पन्न हुए संकरजातिके, भद्र और मन्द्र—इन दो जातियोंके मेलसे पैदा हुए संकर जातिके, भद्र और मृग जातिके संयोगसे उत्पन्न संकरजातिके तथा मृग और मन्द्र—इन दो जातियोंके सम्मिश्रणसे पैदा हुए पर्वताकार गजराज भी, जो सदा मदोन्मत्त रहते थे, उस पुरीमें भरे हुए थे। (तीन योजनके विस्तारवाली अयोध्यामें) दो योजनकी भूमि तो ऐसी थी, जहाँ पहुँचकर किसीके लिये भी युद्ध करना असम्भव था, इसलिये वह पुरी ‘अयोध्या’ इस सत्य एवं सार्थक नामसे प्रकाशित होती थी; जिसमें रहते हुए राजा दशरथ इस जगत्का (अपने राज्यका) पालन करते थे॥ २५-२६॥