1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 59 / Shloka 20 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 59
Shloka 20

Balkand

77 Sarga
22 Shloka
1/59/20
1-Balkand / Sarga 59 Shloka 20
Shloka
विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान्।
महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत् ॥२०॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘वे लोग विकृत एवं विरूप होकर इन लोकोंमें विचरें। साथ ही दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ दोषहीनको भी दूषित किया है, मेरे क्रोधसे दीर्घ-कालतक सब लोगोंमें निन्दित, दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर और दयाशून्य निषादयोनिको प्राप्त करके दुर्गति भोगेगा’॥ २०-२१॥