1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 58 / Shloka 6 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 58
Shloka 6

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/58/6
1-Balkand / Sarga 58 Shloka 6
Shloka
अवमानं कथं कर्तुं तस्य शक्ष्यामहे वयम्।
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्रोधपर्याकुलाक्षरम् ॥६॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

गुरुपुत्रोंका वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर राजा त्रिशंकुने पुन: उनसे इस प्रकार कहा—‘तपोधनो! भगवान् वसिष्ठने तो मुझे ठुकरा ही दिया था, आप गुरुपुत्रगण भी मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार कर रहे हैं; अत: आपका कल्याण हो, अब मैं दूसरे किसीकी शरणमें जाऊँगा’॥