1-Balkand / Sarga 58
Shloka 24
Shloka
नान्यां गतिं गमिष्यामि नान्यच्छरणमस्ति मे।दैवं पुरुषकारेण निवर्तयितुमर्हसि ॥२४॥
Sarga 58 / Shloka 24 Balkand