1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 58 / Shloka 22 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 58
Shloka 22

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/58/22
1-Balkand / Sarga 58 Shloka 22
Shloka
परितोषं न गच्छन्ति गुरवो मुनिपुंगव।
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् ॥२२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘मैंने नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, प्रजाजनोंकी धर्मपूर्वक रक्षा की और शील एवं सदाचारके द्वारा महात्माओं तथा गुरुजनोंको संतुष्ट रखनेका प्रयास किया। इस समय भी मैं यज्ञ करना चाहता था; अत: मेरा यह प्रयत्न धर्मके लिये ही था। मुनिप्रवर! तो भी मेरे गुरुजन मुझपर संतुष्ट न हो सके। यह देखकर मैं दैवको ही बड़ा मानता हूँ। पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है॥ २०—२२॥