1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 58 / Shloka 2 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 58
Shloka 2

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/58/2
1-Balkand / Sarga 58 Shloka 2
Shloka
प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना।
तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान् ॥२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

रघुनन्दन! राजा त्रिशंकुका यह वचन सुनकर वसिष्ठ मुनिके वे सौ पुत्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले— ‘दुर्बुद्धे! तुम्हारे सत्यवादी गुरुने जब तुम्हें मना कर दिया है, तब तुमने उनका उल्लङ्घन करके दूसरी शाखाका आश्रय कैसे लिया?॥ १-२॥