1-Balkand / Sarga 52
Shloka 20
Shloka
एवमुक्तस्तथा तेन वसिष्ठो जपतां वरः।आजुहाव ततः प्रीतः कल्माषीं धूतकल्मषाम् ॥२०॥
Sarga 52 / Shloka 20 Balkand