1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 50 / Shloka 19 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 50
Shloka 19

Balkand

77 Sarga
25 Shloka
1/50/19
1-Balkand / Sarga 50 Shloka 19
Shloka
यदृच्छयेव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ।
कथं पद‍्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने ॥१९॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘महामुने! आपका कल्याण हो। देवताके समान पराक्रमी और सुन्दर आयुध धारण करनेवाले ये दोनों वीर राजकुमार जो हाथीके समान मन्दगतिसे चलते हैं, सिंह और साँड़के समान जान पड़ते हैं, प्रफुल्ल कमलदलके समान सुशोभित हैं, तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं, अपने मनोहर रूपसे अश्विनीकुमारोंको भी लज्जित कर रहे हैं, जिन्होंने अभी-अभी यौवनावस्थामें प्रवेश किया है तथा जो स्वेच्छानुसार देवलोकसे उतरकर पृथ्वीपर आये हुए दो देवताओंके समान जान पड़ते हैं, किसके पुत्र हैं? और यहाँ कैसे, किसलिये अथवा किस उद्देश्यसे पैदल ही पधारे हैं? जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, , संकेत और चेष्टाएँ प्राय: एक-सी हैं। मैं इन दोनों काकपक्षधारी वीरोंका परिचय एवं वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ’॥ १७—२१॥