1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 5 / Shloka 15 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 5
Shloka 15

Balkand

77 Sarga
23 Shloka
1/5/15
1-Balkand / Sarga 5 Shloka 15
Shloka
प्रासादै रत्नविकृतैः पर्वतैरिव शोभिताम् ।
कूटागारैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम् ॥१-५-१५॥

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1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

वहाँके महलोंका निर्माण नाना प्रकारके रत्नोंसे हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरीकी बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्तगृहों अथवा स्त्रियोंके क्रीड़ाभवनों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्रकी अमरावतीके समान जान पड़ती थी॥ १५॥