1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 48 / Shloka 32 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 48
Shloka 32

Balkand

77 Sarga
33 Shloka
1/48/32
1-Balkand / Sarga 48 Shloka 32
Shloka
तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता।
मत्सकाशं मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि ॥३२॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

इन्द्रको इस प्रकार शाप देकर गौतमने अपनी पत्नीको भी शाप दिया—‘दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षोंतक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राखमें पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियोंसे अदृश्य रहकर इस आश्रममें निवास करेगी। जब दुर्धर्ष दशरथ-कुमार राम इस घोर वनमें पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी। उनका आतिथ्य-सत्कार करनेसे तेरे लोभ-मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी’॥ २९—३२॥