1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 46 / Shloka 22 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 46
Shloka 22

Balkand

77 Sarga
23 Shloka
1/46/22
1-Balkand / Sarga 46 Shloka 22
Shloka
प्राञ्जलिर्वज्रसहितो दितिं शक्रोऽभ्यभाषत।
अशुचिर्देवि सुप्तासि पादयोः कृतमूर्धजा ॥२२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

फिर वज्रसहित इन्द्रने हाथ जोड़कर दितिसे कहा—‘देवि! तुम्हारे सिरके बाल पैरोंसे लगे थे। इस प्रकार तुम अपवित्र अवस्थामें सोयी थीं। यही छिद्र पाकर मैंने इस ‘इन्द्रहन्ता’ बालकके सात टुकड़े कर डाले हैं। इसलिये माँ! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो’॥ २२-२३॥