1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 45 / Shloka 32 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 45
Shloka 32

Balkand

77 Sarga
45 Shloka
1/45/32
1-Balkand / Sarga 45 Shloka 32
Shloka
उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्डः सकमण्डलुः।
पूर्वं धन्वन्तरिर्नाम अप्सराश्च सुवर्चसः ॥३२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर उस क्षीरसागरसे एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथमें दण्ड और दूसरेमें कमण्डलु था। उनका नाम धन्वन्तरि था। उनके प्राकट्यके बाद सागरसे सुन्दर कान्तिवाली बहुत-सी अप्सराएँ प्रकट हुईं॥ ३१-३२॥