1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 4 / Shloka 34 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 4
Shloka 34

Balkand

77 Sarga
36 Shloka
1/4/34
1-Balkand / Sarga 4 Shloka 34
Shloka
तन्त्रीलयवदत्यर्थं विश्रुतार्थमगायताम् ।
ह्लादयत् सर्वगात्राणि मनांसि हृदयानि च ।
श्रोत्राश्रयसुखं गेयं तद् बभौ जनसंसदि ॥१-४-३४॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

आज्ञा पाकर वे दोनों भाई वीणाके लयके साथ अपने मनके अनुकूल तार (उच्च) एवं मधुर स्वरमें राग अलापते हुए रामायणकाव्यका गान करने लगे। उनका उच्चारण इतना स्पष्ट था कि सुनते ही अर्थका बोध हो जाता था। उनका गान सुनकर श्रोताओंके समस्त अंगोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया तथा उन सबके मन और आत्मामें आनन्दकी तरंगें उठने लगीं। उस जनसभामें होनेवाला वह गान सबकी श्रवणेन्द्रियोंको अत्यन्त सुखद प्रतीत होता था॥ ३३-३४॥