1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 4 / Shloka 33 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 4
Shloka 33

Balkand

77 Sarga
36 Shloka
1/4/33
1-Balkand / Sarga 4 Shloka 33
Shloka
विचित्रार्थपदं सम्यग्गायकौ समचोदयत् ।
तौ चापि मधुरं रक्तं स्वचित्तायतनिःस्वनम् ॥१-४-३३॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

आज्ञा पाकर वे दोनों भाई वीणाके लयके साथ अपने मनके अनुकूल तार (उच्च) एवं मधुर स्वरमें राग अलापते हुए रामायणकाव्यका गान करने लगे। उनका उच्चारण इतना स्पष्ट था कि सुनते ही अर्थका बोध हो जाता था। उनका गान सुनकर श्रोताओंके समस्त अंगोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया तथा उन सबके मन और आत्मामें आनन्दकी तरंगें उठने लगीं। उस जनसभामें होनेवाला वह गान सबकी श्रवणेन्द्रियोंको अत्यन्त सुखद प्रतीत होता था॥ ३३-३४॥