1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 4 / Shloka 30 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 4
Shloka 30

Balkand

77 Sarga
36 Shloka
1/4/30
1-Balkand / Sarga 4 Shloka 30
Shloka
पूजयामास पूजार्हौ रामः शत्रुनिबर्हणः ।
आसीनः काञ्चने दिव्ये स च सिंहासने प्रभुः ॥१-४-३०॥

Bhashya Content For This Shloka

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

एक समय सर्वत्र प्रशंसित होनेवाले राजकुमार कुश और लव अयोध्याकी गलियों और सड़कोंपर रामायणके श्लोकोंका गान करते हुए विचर रहे थे। इसी समय उनके ऊपर भरतके बड़े भाई श्रीरामकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने उन समादरयोग्य बन्धुओंको अपने घर बुलाकर उनका यथोचित सम्मान किया। तदनन्तर शत्रुओंका संहार करनेवाले श्रीराम सुवर्णमय दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए। उनके मन्त्री और भाई भी उनके पास ही बैठे थे। उन सबके साथ सुन्दर रूपवाले उन दोनों विनयशील भाइयोंकी ओर देखकर श्रीरामचन्द्रजीने भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नसे कहा—‘ये देवताके समान तेजस्वी दोनों कुमार विचित्र अर्थ और पदोंसे युक्त मधुर काव्य बड़े सुन्दर ढंगसे गाकर सुनाते हैं। तुम सब लोग इसे सुनो।’ यों कहकर उन्होंने उन दोनों भाइयोंको गानेकी आज्ञा दी॥