1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 4 / Shloka 25 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 4
Shloka 25

Balkand

77 Sarga
36 Shloka
1/4/25
1-Balkand / Sarga 4 Shloka 25
Shloka
औदुम्बरीं ब्रुसीमन्यः स्वस्ति केचित् तदावदन् ।
आयुष्यमपरे प्राहुर्मुदा तत्र महर्षयः ॥१-४-२५॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

किसी दूसरेने आनन्दमग्न होकर जटा बाँधनेके लिये रस्सी दी तो किसीने समिधा बाँधकर लानेके लिये डोरी प्रदान की। एक ऋषिने यज्ञपात्र दिया तो दूसरेने काष्ठभार समर्पित किया। किसीने गूलरकी लकड़ीका बना हुआ पीढ़ा अर्पित किया। कुछ लोग उस समय आशीर्वाद देने लगे—‘बच्चो! तुम दोनोंका कल्याण हो।’ दूसरे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक बोल उठे—‘तुम्हारी आयु बढ़े।’ इस प्रकार सभी सत्यवादी मुनियोंने उन दोनोंको नाना प्रकारके वर दिये॥ २४-२५