1-Balkand / Sarga 4
Shloka 24
Shloka
जटाबन्धनमन्यस्तु काष्ठरज्जुं मुदान्वितः ।यज्ञभाण्डमृषिः कश्चित् काष्ठभारं तथा परः ॥१-४-२४॥
Sarga 4 / Shloka 24 Balkand