1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 4 / Shloka 12 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 4
Shloka 12

Balkand

77 Sarga
36 Shloka
1/4/12
1-Balkand / Sarga 4 Shloka 12
Shloka
तौ राजपुत्रौ कार्त्स्न्येन धर्म्यमाख्यानमुत्तमम् ।
वाचोविधेयं तत्सर्वं कृत्वा काव्यमनिन्दितौ ॥१-४-१२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

वे दोनों राजपुत्र सब लोगोंकी प्रशंसाके पात्र थे, उन्होंने उस धर्मानुकूल उत्तम उपाख्यानमय सम्पूर्ण काव्यको जिह्वाग्र कर लिया था और जब कभी ऋषियों, ब्राह्मणों तथा साधुओंका समागम होता था, उस समय उनके बीचमें बैठकर वे दोनों तत्त्वज्ञ बालक एकाग्रचित्त हो रामायणका गान किया करते थे॥ १२-१३॥