1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 39 / Shloka 10 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 39
Shloka 10

Balkand

77 Sarga
26 Shloka
1/39/10
1-Balkand / Sarga 39 Shloka 10
Shloka
हर्तारं जहि काकुत्स्थ हयश्चैवोपनीयताम् ।
यज्ञच्छिद्रं भवत्येतत् सर्वेषामशिवाय नः ॥१-३९-१०॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘काकुत्स्थ! महामना सगरके उस अश्वका अपहरण होते समय समस्त ऋत्विजोंने यजमान सगरसे कहा—‘ककुत्स्थनन्दन! आज पर्वके दिन कोई इस यज्ञसम्बन्धी अश्वको चुराकर बड़े वेगसे लिये जा रहा है। आप चोरको मारिये और घोड़ा वापस लाइये, नहीं तो यज्ञमें विघ्न पड़ जायगा और वह हम सब लोगोंके लिये अमंगलका कारण होगा। राजन्! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण हो’॥