1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 37 / Shloka 32 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 37
Shloka 32

Balkand

77 Sarga
32 Shloka
1/37/32
1-Balkand / Sarga 37 Shloka 32
Shloka
भक्तश्च यः कार्तिकेये काकुत्स्थ भुवि मानवः ।
आयुष्मान् पुत्रपौत्रैश्च स्कन्दसालोक्यतां व्रजेत् ॥१-३७-३२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

काकुत्स्थ! इस पृथ्वीपर जो मनुष्य कार्तिकेयमें भक्तिभाव रखता है, वह इस लोकमें दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न हो मृत्युके पश्चात् स्कन्दके लोकमें जाता है॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥