1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 37 / Shloka 22 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 37
Shloka 22

Balkand

77 Sarga
32 Shloka
1/37/22
1-Balkand / Sarga 37 Shloka 22
Shloka
जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव ।
सुवर्णं पुरुषव्याघ्र हुताशनसमप्रभम् ।
तृणवृक्षलतागुल्मं सर्वं भवति काञ्चनम् ॥१-३७-२२॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

पुरुषसिंह रघुनन्दन! तभीसे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णका नाम जातरूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्णका तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था। उस गर्भके सम्पर्कसे वहाँका तृण, वृक्ष, लता और गुल्म—सब कुछ सोनेका हो गया॥ २२॥