1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 37 / Shloka 19 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 37
Shloka 19

Balkand

77 Sarga
32 Shloka
1/37/19
1-Balkand / Sarga 37 Shloka 19
Shloka
काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम् ।
ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ॥१-३७-१९॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

गंगाके गर्भसे जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा (गंगा सुवर्णमय मेरुगिरिसे प्रकट हुई हैं; अत: उनका बालक भी वैसे ही रूप-रंगका हुआ)। पृथ्वीपर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँकी भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी। उसके आस-पासका स्थान अनुपम प्रभासे प्रकाशित होनेवाला रजत हो गया। उस तेजकी तीक्ष्णतासे ही दूरवर्ती भूभागकी वस्तुएँ ताँबे और लोहेके रूपमें परिणत हो गयीं॥ १८-१९॥