1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 35 / Shloka 10 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 35
Shloka 10

Balkand

77 Sarga
24 Shloka
1/35/10
1-Balkand / Sarga 35 Shloka 10
Shloka
हुत्वा चैवाग्निहोत्राणि प्राश्य चामृतवद्धविः ।
विविशुर्जाह्नवीतीरे शुभा मुदितमानसाः ॥१-३५-१०॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

उस समय सबने गंगाजीके तटपर डेरा डाला। फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद अग्निहोत्र करके अमृतके समान मीठे हविष्यका भोजन किया। तदनन्तर वे सभी कल्याणकारी महर्षि प्रसन्नचित्त हो महात्मा विश्वामित्रको चारों ओरसे घेरकर गंगाजीके तटपर बैठ गये॥ ९-१०॥