1-Balkand / Sarga 33
Shloka 14
Shloka
स च तां कालयोगेन प्रोवाच रघुनन्दन ।परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते किं करोमि तव प्रियम् ॥१-३३-१४॥
Sarga 33 / Shloka 14 Balkand