1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 32 / Shloka 12 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 32
Shloka 12

Balkand

77 Sarga
26 Shloka
1/32/12
1-Balkand / Sarga 32 Shloka 12
Shloka
तास्तु यौवनशालिन्यो रूपवत्यः स्वलङ्कृताः ।
उद्यानभूमिमागम्य प्रावृषीव शतह्रदाः ॥१-३२-१२॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्यसे सुशोभित थीं। धीरे-धीरे युवावस्थाने आकर उनके सौन्दर्यको और भी बढ़ा दिया। रघुवीर! एक दिन वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यान-भूमिमें आकर वर्षाऋतुमें प्रकाशित होनेवाली विद्युन्मालाओंकी भाँति शोभा पाने लगीं। सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हुई वे अंगनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोदमें मग्न हो गयीं॥ १२-१३॥