1-Balkand / Sarga 31
Shloka 3
Shloka
अभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं ज्वलन्तमिव पावकम् ।ऊचतुर्परमोदारं वाक्यं मधुरभाषिणौ ॥१-३१-३॥
Sarga 31 / Shloka 3 Balkand