1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 30 / Shloka 11 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 30
Shloka 11

Balkand

77 Sarga
26 Shloka
1/30/11
1-Balkand / Sarga 30 Shloka 11
Shloka
आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि दृश्यते ।
तथा मायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम् ॥१-३०-११॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटा सारे आकाशको घेरकर छायी हुई दिखायी देती है, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस सब ओर अपनी माया फैलाते हुए यज्ञमण्डपकी ओर दौड़े आ रहे थे। उनके अनुचर भी साथ थे। उन भयंकर राक्षसोंने वहाँ आकर रक्तकी धाराएँ बरसाना आरम्भ कर दिया॥ ११-१२॥